Sobti-vaid samvad : lekhan aur lekhak
Material type:
TextPublication details: New Delhi Rajkamal Prakashan 2015Description: 207pISBN: - 9788126713004
- H 891.43 SOB
| Item type | Current library | Call number | Status | Date due | Barcode | Item holds |
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Gandhi Smriti Library | H 891.43 SOB (Browse shelf(Opens below)) | Available | 181752 |
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क दिन दो बड़े मिल बैठे और बातें चल निकलींदृगुज़रे हुए ज़माने की, अगले ज़मानों की। वर्तमान तो बेशक हर पहलू से उन बातों में शामिल रहा। बातों का सिलसिला दशकांे के आर-पार फैलता रहादृअपने समय को सीधे पढ़ने, समझने और लगातार ढीठ होते हुए युग की बगै़रत निर्लज्ज आँखों में आँखें डालकर देखते रहने के संकल्प के साथ। हमारे दो महत्त्वपूर्ण लेखक, कृष्णा सोबती और कृष्ण बलदेव वैद। शिमला के राष्ट्रपति निवास का उर्वर वातावरण और दशकों का सहेजा, रचा और निभाया हुआ बौद्धिक उत्तेजन और रचनात्मक तापदृ‘सोबती-वैद संवाद’ इन्हीं तत्त्वों के संयोग और संयोजन का परिणाम है। इस संवाद में से गुज़रते हुए हम अपने देखे हुए वक़्त को अपने दो विशिष्ट रचनाकारों की नज़र से एक बार फिर देखते हैं और आज के नेपथ्य की आहटें सुनने लगते हैं। इस अनौपचारिक बातचीत में आप दो अलग-अलग वैचारिक मुखड़ों को पहचानते हैं, उनकी वैचारिक प्रक्रिया को और रचनात्मक पाठ की गहराइयों को भी। इन दो कलमों की अपनी अपनी धड़कनें भी सुनी जा सकती हैंदृजिनसे ‘ज़िन्दगीनामा’, दिलो-दानिश’, ‘उसका बचपन’, ‘गुज़रा हुआ ज़माना’, ‘हम हशमत’, ‘ऐ लड़की’, ‘विमल उफषर्् जाएँ तो जाएँ कहाँ’ और ‘काला कोलाज’, जैसी क्लासिक हो चली कृतियाँ कैसे और कब रची गईं, कौन-सी बेचैनी किस किताब केे पन्नों पर साकार हुई, कैसे और किस ब्रान्ड का काग़ज़ और किस नाम का पेन था जो सृजनात्मक घटित का साक्षी रहादृयह सभी कुछ इस संवाद में उजागर होता है। और उजागर होता है वह पूरा युग भी जिसमें बँटवारा हुआ, आज़ादी मिली, गांधी की हत्या हुई, देश की बहाली के नये स्वप्न शुरू हुए, नयी विचारधाराओं ने नये हौसले दिए, उत्तरआधुनिकता ने किष्स्म-किष्स्म के अन्त घोषित किए, और आखि़र में भूमंडलीकरण ने सब कुछ को झंझोड़ डाला। यह सब इस संवाद का हिस्सा है। और इसीलिए हर अपूर्व मुलाकषत की तरह अधूरी होते हुए भी, यह अनूठी किताब हमें एक मुकम्मल पाठकीय स्मृति देकर ख़त्म होती है।

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