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082 _aH 294.54 KAP
100 _aKapooriya, B.K. Yogita
_921772
245 _aDivyata ki aur badte kadam bhag 1
260 _aNew Delhi
_bLittle Bird Publications
_c2024
300 _a143p.
520 _aइसी प्रकार विश्व की प्रत्येक आत्मा में परमात्मा की दी हुई आत्म-शक्तियाँ एवं दिव्य-गुण निहित हैं। परन्तु जैसे ही जीवात्मा माया से आवृत भूमण्डल पर कदम रखती है। वो भूल जाती है कि वो किसकी सन्तान है? उसके पारलौकिक परमपिता परमात्मा शिव ने उसे किस लिए भेजा हैं? उस के दिव्य-गुण व दिव्य आत्म-शक्तियाँ कौन सी हैं? उस परमपिता से बिछुड़ कर यह नश्वर शरीर क्यूँ धारण किया है? वो जीवात्मा माया के फेरे में आ कर अपना स्वरूप, गुण, शक्ति, अपना लक्ष्य, यहाँ तक कि परमपिता को भी विस्मृत कर देती है। भौतिकता के सुनहरे म×च पर पाँच विकारों रूपी रावण भी उसे आ घेरता है।
942 _cB
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