| 000 | 03201nam a22001697a 4500 | ||
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| 005 | 20260724162617.0 | ||
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| 082 | _aH RAG V | ||
| 100 |
_aRag, Vandana _921208 |
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| 245 | _aSarak-fanda | ||
| 260 |
_aNew Delhi _bRajkamal Prakashan _c2026 |
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| 300 | _a275p. | ||
| 520 | _aबिट्टो अपनी माँ लाजो के जीवन और समय को समझने की यात्रा पर निकली है, जिनकी पत्थर मारकर हत्या कर दी गई है। बिट्टो के स्कूली दोस्तों का एक समूह है जहाँ भिन्न धार्मिक पहचान रखनेवाले ‘दोस्त’ समूह से बाहर खदेड़ दिए गए हैं; और बिट्टो जो इस बँटवारे के ख़िलाफ़ है, उससे पूछा जा रहा है कि “सू, हमेशा गुस्से में क्यों रहती है आजकल तू?” यह रोमान के ख़त्म होने और उसके कॉम्प्लिकेटेड होते जाने का भी आख्यान है। ‘सरकफंदा’ विभाजन की डरावनी निरन्तरता के बारे में है, जहाँ लोग देश से प्यार का दम तो भरते हैं लेकिन आपसी बन्धुत्व की भावना को ख़त्म करने में लगे हैं। ‘सरकफंदा’ का एक सिरा गुलाम भारत में खुलता है दूसरा निपट वर्तमान में। दोनों के बीच वह भविष्य है जिस पर यह कसता ही जा रहा है। इस उपन्यास में बिल्ला उर्फ़ लाइब्रेरियन एक अद्भुत रूपक और रिलीफ़ की तरह उपस्थित है जो अतीत और वर्तमान, भ्रम और ज्ञान के सरकफंदे के बीच निर्लिप्त आवाजाही रखता है और वर्तमान पर क़ाबिज़ घातक परछाइयों के बीच अपने खेल से जीवन की स्वाभाविकता को राह दिखलाता चलता है। लाजो और बिट्टो का सिनेमची होना भी वह दूरी सम्भव करता है कि घट रहे को उसके घटाटोप से ज़रा दूर होकर देखा जा सके। हमारे समय के यथार्थ की सघन, आवेग-भरी, कलात्मक दुनिया। | ||
| 650 |
_aHindi Novel _921209 |
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| 942 | _cB | ||
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