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| 082 | _aH PRA | ||
| 100 |
_aPratyaksha _920867 |
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| 245 | _aShisha ghar | ||
| 260 |
_aNew Delhi _bRajkamal Prakashan _c2026 |
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| 300 | _a302p. | ||
| 520 | _a‘शीशाघर’ के केन्द्र में एक परिवार है जो सन् सैंतालिस में बिखरना शुरू होता है तो बिखरता ही जाता है। और जब हम एक मुल्क के, एक भरी-पूरी दुनिया के विभाजित होते जाने की त्रासदी से गुज़र रहे होते हैं तब एक इलहाम की तरह यह बात भीतर प्रकट होती है कि यह उपन्यास विभाजन और बिखराव से ज़्यादा उस अन्दरूनी इनसानी एकता के बारे में है जो इसके चरित्रों को बिखरकर भी बिखरने नहीं देती और वे एक-दूसरे से हज़ारों किलोमीटर दूर, दूसरे देशों में अपना रोज़मर्रा का जीवन जीते हुए भी एक-दूसरे से गहरे तौर पर जुड़े हुए हैं। इस उपन्यास के केन्द्र में है प्रेम, जिसका प्रवाह धर्म, नस्ल, राष्ट्र और भूगोल के सिरों को धूमिल करता, साथ ही लोगों के बसने, उजड़ने और फिर बसने की यादों को सहेजता चलता है। केन्द्रीय कथा से इतर भी इसमें बहुतेरे ऐसे चरित्र हैं जो प्रेम की आग में झुलसकर बन और बिगड़ रहे हैं या कि उनका व्यक्तित्व उस प्रेम की याद से बन रहा है। कभी न भूलनेवाले यादगार किरदारों, उनके द्वन्द्व और चाहनाओं, ज़िद और लापरवाहियों से बुनी हुई, देखी-जानी दुनिया के समानान्तर उतनी ही ज़िन्दा, सम्मोहक और मानीख़ेज़ एक दूसरी दुनिया। | ||
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