000 01482nam a22001697a 4500
003 0
005 20260616100544.0
020 _a9788126719662
082 _aH SOB K
100 _aSobti, krishna
_9814
245 _aYaron ke yaar
260 _aNew Delhi
_bRajkamal Prakashan
_c2023
300 _a71p.
520 _aराजधानी का एक सरकारी दफ्तर, उसकी आबो-हवा और वहाँ काम करने वाले लोगों की रग-रग का हाल ! वास्तविकता के एक-एक शेड को कम-से-कम शब्दों में पकड़कर सँजो देने में माहिर कृष्णा जी की भाषा इस कृति में भी अपने रचनात्मक शिखर पर है ! उनकी तमाम कृतियों की तरह यह उपन्यास भी उनकी इस धारणा की पैरवी करता है कि 'किसी भी व्यक्ति के लिए, जिसकी मूल और आन्तरिक प्रेरणा सत्य है, केवल साहित्य ही एक ऐसा कवच है, जिसके भीतर वह अपनी अस्मिता को सुरक्षित रख सकता है !'
650 _aHindi Novel
_920464
942 _cB
999 _c361456
_d361456