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082 _aH 305.52 THA
100 _aThapar, Romila
_97538
245 _abharat mein public intellectual
250 _a2nd ed.
260 _aNew Delhi
_bVani Prakashan
_c2020
300 _a160p.
520 _a‘जैसा कि सभी धर्मों के साथ होता है, हिन्दू धर्म ने भी अनेक परिवर्तन देखे। अनेक शताब्दियों तक, राम की ऐतिहासिकता पर कि वे विष्णु के अवतार हैं, इसका उनके लिए कोई महत्त्व न था जो उन्हें पूजते थे, परन्तु आज उन्हें एक ऐतिहासिक पुरुष के रूप में देखा जाता है। अनेक शताब्दियों तक विभिन्न सम्प्रदाय अपने देवों-इष्टों को स्वयं चुनते थे जिनकी वे पूजा करना चाहते थे और स्वतन्त्र थे कि वे कौन से ग्रन्थों को पवित्र मानें। कोई एक मात्र धर्मग्रन्थ न था क्योंकि हिन्दू धर्म के सम्प्रदाय किसी एक धर्मग्रन्थ पर आधारित नहीं थे। परन्तु आज भगवद्गीता को ‘राष्ट्रीय’ पुस्तक करार दिया जाता है और सभी स्कूलों में उसे पढ़ाने की माँग की जाती है। अन्य कारणों के अलावा, यह धर्म का राष्ट्रीयता के साथ सम्मिश्रण है जो अन्यथा पृथक्-पृथक् है। और यदि हम धर्म और राष्ट्रीयता का सम्मिश्रण करते हैं तो फिर बहुधर्मी भारत में यह माँग उठना स्वाभाविक है कि क़ुरान, बाइबिल, गुरुग्रन्थ साहिब, अवेस्ता और अन्य धार्मिक समुदायों के धर्मग्रन्थों को भी ‘राष्ट्रीय’ पुस्तकें घोषित किया जाये तो क्या भारतीय प्रजातन्त्र में धर्मनिरपेक्षता धार्मिक पुस्तकों के वाचनालय तक सिमट कर रह जायेगी। निश्चय ही इन पुस्तकों को स्कूलों में पढ़ाया जा सकता है, परन्तु राष्ट्रीय पुस्तक के रूप में नहीं अपितु किसी विशिष्ट धर्म की पुस्तक के रूप में।’
650 _aSocial Science
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