| 000 | 02269nam a22001697a 4500 | ||
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| 005 | 20260310133308.0 | ||
| 020 | _a9789363066458 | ||
| 082 | _aH 305.42 KAL | ||
| 100 |
_aKaliya, Mamta _92897 |
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| 245 | _aNaya naari vimarsh : vartalap me | ||
| 260 |
_aNew Delhi _bLIttle Bird Publications _c2026 |
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| 300 | _a198 p. | ||
| 520 | _aअब एक नजर पिछले एक दशक के महिला लेखन पर डालना प्रासंगिक होगा क्योंकि स्त्री की अवस्थिति, संघर्ष, प्रगति और चेतना का यह एक प्रामाणिक आईना है। इसमें वरिष्ठ से लेकर युवा रचनाकारों का योगदान रहा है। स्त्री का जो बेधक, बेधड़क, बुलंद रूप आज सामने आ रहा है उसके पीछे हमारी पूर्व व अपूर्व रचनाकारों का योगदान रहा है। महादेवी वर्मा ने सन् 1934 में ही लिख दिया था, ”हमे न किसी पर जय चाहिए न पराजय; न किसी की प्रभुता चाहिए न किसी पर प्रभुत्व; केवल अपना वह स्थान चाहिए, वह स्वत्व चाहिए जिसके बिना इस समाज का उपयोगी अंग नहीं बन सकती।“ स्त्री विमर्शकार सिमोन द बोवुआ के सिर विजय और विचार का सेहरा बाँधते हैं जबकि सिमोन से बहुत वर्ष पहले महादेवी वर्मा ने अपने गद्य से और सुभद्रा कुमारी चैहान ने अपने पद्य से स्त्राी की शक्ति का जयघोष किया था। | ||
| 650 |
_aNari Vimarsh _918539 |
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| 942 | _cB | ||
| 999 |
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