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| 005 | 20260226162446.0 | ||
| 020 | _a9788196342562 | ||
| 082 | _aH CHA A | ||
| 100 |
_aChatursen, Aacharya _917678 |
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| 245 | _aVaishali Ki Nagarvadhu | ||
| 260 |
_aNew Delhi _bGarima Publishers _c2025 |
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| 300 | _a455 p. | ||
| 520 | _aमैं सहस्र बार इस शब्द को दुहराती हूँ! वज्जीसंघ का यह धिक्कृत क़ानून वैशाली जनपद के यशस्वी गणतंत्र का कलंक हैं। भन्ते, मेरा अपराध केवल यही है कि विधाता ने मुझे यह अथाह रूप दिया। इसी अपराध के लिए आज मैं अपने जीवन के गौरव को लांछना और अपमान के पंक में डुबो देने को विवश की जा रही हूँ। इसी से मुझे स्त्रीत्व के उन सब अधिकारों से वंचित किया जा रहा है जिन पर प्रत्येक कुलवधू का अधिकार है। - इसी पुस्तक से | ||
| 650 |
_aHindi Upanyaas _917679 |
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| 942 | _cB | ||
| 999 |
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