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082 _aH 780.954 DES
100 _aDeshpande, Satyasheel
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245 _aGaan Gungaan
260 _aNoida
_bSetu Prakashan
_c2024
300 _a414 p.
520 _aहमारे शास्त्रीय संगीत के रसिकों की कोई कमी नहीं है। नयी तकनालजी ने उसे सहज सुलभ करा के उनकी संख्या शायद कई गुना बड़ा दी है। लेकिन सार्वजनिक परिसर में संगीत और संगीतकारों पर विचार-विश्लेषण का बहुत अभाव है। यह अभाव हिन्दी अंचल में विकराल है हालाँकि ज्यादातर घराने हिन्दी अंचल में ही उपजे और वहीं से गायब हैं। संगीतकारों की आपस में चर्चा होती है, वाद-विवाद, बहस आदि भी लेकिन उसकी सार्वजनिक अभिव्यक्ति नहीं होती। बहुत कम संगीतकारों ने स्वयं लिखकर विचार या विश्लेषण किया है। सत्यशील देशपाण्डे उन दुर्लभ संगीतकारों में हैं (जिनकी पीढ़ी में और कोई, हमारे जाने, नहीं है) जिन्होंने समझ, संवेदना, रसिकता और बुद्धि से संगीत के विभिन्न पक्षों और अपने अनेक बुजुर्ग संगीतकारों पर मराठी में लिखा है। संगीत पर यह मूल्यवान् चिन्तनपरक सामग्री हिन्दी अनुवाद में, एक पुस्तक के रूप में, प्रकाशित करते हुए हमें प्रसन्नता है। यह पुस्तक हिन्दी अंचल के संगीत-रसिकों का रसास्वादन सघन और सचेत करने में सहायक होगी ऐसी उम्मीद है।
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700 _aDeshpande, Usha Bajaj
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