| 000 | 01829nam a22001697a 4500 | ||
|---|---|---|---|
| 003 | 0 | ||
| 005 | 20260107161236.0 | ||
| 020 | _a9788119899548 | ||
| 082 | _aH 320.954 RAV | ||
| 100 |
_aRavibhushan _916851 |
||
| 245 | _aFaasiwaad Ki Dastak | ||
| 260 |
_aNoida _bSetu Prakashan _c2024 |
||
| 300 | _a438 p. | ||
| 520 | _aअँग्रेज़ों ने यह कार्य (विभक्तीकरण और विभेदीकरण का) अपने स्वार्थ के लिए किया था। देश पर हुकूमत क़ायम करने के लिए देशवासियों को धर्मों, मज़हबों और विभिन्न धड़ों में विभाजित करना उनके अपने लिए फ़ायदेमन्द था। स्वतन्त्र भारत में वही तरीक़ा-कभी कम, कभी अधिक अपनाया जाता रहा है। यह भारत की आत्मा को कुचलना और लहूलुहान करना है। यहीं से सद्भाव समाप्त होने लगा और दुर्भाव बढ़ने लगा। देश में चुनौतियों और संकटों का इस स्थिति में बढ़ना, बढ़ते जाना स्वाभाविक था। आज भारतीय लोकतन्त्र और ‘सेकुलरिज्म’ के समक्ष जैसी चुनौतियाँ हैं, वैसी पहले कभी नहीं थीं। – इसी पुस्तक से | ||
| 650 |
_aRajniti Vichar _916962 |
||
| 942 | _cB | ||
| 999 |
_c360218 _d360218 |
||