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005 20251203143247.0
020 _a9789360862480
082 _aH KUM K
100 _aKumar, Krishna
_916381
245 _aBhasha Ki Sanjeevani
260 _aNew Delhi
_bRajkamal Prakashan
_c2025
300 _a167 p.
520 _aकृष्ण कुमार अपने पाठकों को पहचानते हैं और उनसे आत्मीयता बढ़ाने के अन्दाज़ में लिखते हैं। पहली बार उनका गद्य पढ़ रहे नए पाठक इस आत्मीयता का स्पर्श पाकर चकित होते हैं। निबन्ध की विधा कृष्ण कुमार को विशेष प्रिय रही है यद्यपि वे कहानी और संस्मरण भी चाव से लिखते रहे हैं। ‘भाषा की संजीवनी’ की शुरुआत थोड़ा-बहुत भी बता पाने के संघर्ष और सुकून से होती है और अन्त भाषा के जीवनदायी चरित्र के अभिन्दन से। इन दो विचार-ध्रुवों के बीच इस संग्रह में अठ्ठारह निबन्ध, समीक्षा-लेख और संस्मरण शामिल हैं। विषयों की विविधता के बीच पाठकों को कृष्ण कुमार के स्थायी सरोकार मिलेंगे—प्रकृति, स्त्री, सरकार और पढ़ाई। इन सभी के भीतर और इर्द-गिर्द मची भगदड़ और हिंसा पर टिप्पणी भी मिलेगी। इस निबन्ध विविधा से गुज़रते हुए पाठक याद करेंगे कि कृष्ण कुमार के लिए अगर कोई चीज़ नागवार है तो वह ‘विचार का डर’ है जो उनके एक प्रसिद्ध संग्रह का शीर्षक भी है।
650 _aNibandh Hindi
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