| 000 | 02295nam a22001697a 4500 | ||
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| 999 |
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| 003 | 0 | ||
| 005 | 20220407201705.0 | ||
| 020 | _a9789386300270 | ||
| 082 | _aH VER V | ||
| 100 | _aVerma , Vrindavan Lal | ||
| 245 | _aMaharani Durgawati | ||
| 260 |
_aNew Delhi _bPrabhat books _c2020. |
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| 300 | _a236 p. | ||
| 520 | _aमहारानी दुर्गावती उद्यान में घूमने लगी। फूलों दुर पर अधमुँदी बड़ी-बड़ी आँखें रिपट-रिपट सी जा रही थीं, पँखुड़ियों की गिनती तो बहुत दूर की बात थी। कभी ऊँचे परकोटे पर दृष्टि जाती, कभी नीचे के परकोटे और ढाल पर, दूर के पहाड़ों पर और बीच के मैदानों के हरे-भरे लहराते खेतों पर। दूर के जंगल में जैसे कुछ टटोल रही हो, फुरेरू आती और नसें उमग पड़तीं। क्या ऐसे धनुष-बाण नहीं बनाए जा सकते, जिनसे कोस भर की दूरी का भी लक्ष्यवेध किया जा सके ? हमारे कालंजर की फौलाद संसार भर में प्रसिद्ध है, यहाँ के खंग, भाले, तीर, छुरे युगों से ख्याति पाए हुए हैं। सुनते हैं, कभी चार हाथ लंबा तीर तैयार किया जाता था, जो हाथी तक को वेधकर पार हो जाता था। चंदेलों का वैभव फिर लौट सकता है, बघेले, बुंदेले और चंदेले मिलकर चलें तो सबकुछ कर सकते हैं; तुर्क, मुगल, पठान, सबको हरा सकते हैं। कैसे एक हों ? | ||
| 650 | _aFiction | ||
| 942 | _cB | ||