‘पुलिस विभाग’ समाज का सबसे अधिक गलत समझा जाने वाला महकमा है। जनता की अपेक्षाएँ और देश का कानून कई बार विपरित प्रवाह में होते है, ऐसे में पुलिस वालों का जीवन हमेशा तराजू पर तौला जाता रहता है। सविता मिश्रा जी ने लघुकथा-संकलन के माध्यम से इस संघर्ष और अन्तद्र्वन्द का चित्राण एक चित्राकार की तरह संजोने का प्रयास किया है। इस संग्रह की सफलता लिए मेरी शुभकामनाएँ।