Premchand

Premasharm - New Delhi Garima Publishers 2026 - 367p.

अपनी पैतृक जमींदारी तीन भाइयों में बंट जाने पर महत्त्वाकांक्षी बाबू ज्ञान शंकर ने पहले तो अपने ससुर राय कमलानंद की जायदाद हथियाने की कोशिश की, किंतु वहां दाल गलती न देख कर उन्होंने अपनी विधवा साली और उस की जमींदारी पर भी दांत गड़ाए। इस के लिए उन्होंने न जाने कितने ढोंग किए, फिर भी क्या अपने उद्देश्य में सफल हो सके?
‘रामराम’, ‘कृष्णकृष्ण’ जपते हुए पराया माल अपना बनाने के चक्कर में क्या वह अपने हिस्से में आई पैतृक जमींदारी को भूल सके? अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए उन्होंने प्रजा पर क्याक्या अत्याचार नहीं किए- इसी की गाथा है-प्रेमचंद का उपन्यास ‘प्रेमाश्रम’।
सन 1922 में प्रकाशित इस उपन्यास में प्रेमचंद ने पहली बार पारिवारिक क्षेत्र से उठ कर सामाजिक तथा राजनीतिक क्षेत्रें में प्रवेश किया, लेकिन इस का यह मतलब नहीं कि वह परिवार का मोह त्याग सके। प्रेमाश्रम की कथा भी – प्रभाशंकर, राय कमलानंद, गायत्री और डिप्टी ज्वालासिंह चार परिवारों की पृष्ठभूमि पर रची गई है। भारतीय स्वाधीनता संग्राम की पहली झांकी और भावनागत रामराज्य का स्वप्न ‘प्रेमाश्रम’ की निजी विशेषता है।

9788119633746


Hindi Novel

H PRE