Smriti aur dansh: vibhajan, nirantarata aur teesri pirhi
Material type:
TextPublication details: New Delhi Rajkamal Prakashan 2025Description: 231pISBN: - 9789360865030
- H 954.04 KAU
| Item type | Current library | Call number | Status | Date due | Barcode | Item holds |
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Gandhi Smriti Library | H 954.04 KAU (Browse shelf(Opens below)) | Available | 181690 |
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| H 954.04 GAU Ambedkar Jansanchaar | H 954.04 GAU Ambedkar Jansanchaar | H 954.04 GAU Ambedkar Jansanchaar | H 954.04 KAU Smriti aur dansh: vibhajan, nirantarata aur teesri pirhi | H 954.04 KHI Bharatnama / tr. by Abhay Kumar Dube | H 954.04 LAJ Lajpat Rai Ne Kaha Tha/ed. by Giriraj Sharan | H 954.04 LAP Azadi aadhi raat ki |
जैसे-जैसे मैं जीवन में आगे बढ़ती गई, मैंने कट्टरपन्थियों के पागलपन का विरोध करने की हमेशा कोशिश की, चाहे वे किसी भी समुदाय के हों।...मुझे पता था कि मेरे बचपन के सपनों का भारत बिखर गया था। शायद बलवन्त का भारत भी बिखर गया इसीलिए मैं और वह इस असामान्य प्रस्तावना के ज़रिये एक सह-अनुभूति रखते हैं, जिसे मैं पेश कर रही हूँ क्योंकि जब मैं इस अशान्त राष्ट्र के इतिहास को याद करती हूँ तो मेरा मन इसी तरह भटकता है।
क्या बलवन्त कौर की यह कृति आत्मकथा, साहित्य-अध्ययन, इतिहास और समाजशास्त्र के बीच आवाजाही करती है? नहीं; यह इन सबको एक साथ लाकर बल्कि मिलाकर अन्दरूनी सरहदों से मुक्त एक अवकाश बनाती है जिसमें आप किसी अनुशासन के प्रति आत्मसजग हुए बगैर घूम-फिर सकते हैं। आपको पता नहीं चलता कि कब व्यक्तिगत संस्मरण सुनते-सुनते साहित्यिक कृतियों के साथ आपका संवाद शुरू हो गया और कब इतिहासकारों तथा समाजशास्त्रियों के हवाले से आप हिंसा, पहचान, अन्यीकरण, विभाजन-विस्थापन के सवालों से दो-चार होने लगे। विभाजन और उसकी निरन्तरता पर यह निस्सन्देह एक अनोखी किताब है।

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