Bharatiya bhasha evam boli : dasha aur disha
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TextPublication details: New Delhi Hans Prakashan 2025Description: 139pISBN: - 9789394277328
- H 491.4 DEV
| Item type | Current library | Call number | Status | Date due | Barcode | Item holds |
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Gandhi Smriti Library | H 491.4 DEV (Browse shelf(Opens below)) | Available | 181120 |
पांडेय जी ने नागरी लिपि को हिंदी की आत्मा माना। उन्होंने कहा, 'विश्व की कोई भी लिपि अपने वर्तमान रूप में नागरी लिपि के समान नहीं। उनके अनुसार, नागरी लिपि वैज्ञानिक, सरल और प्राचीन है, जो हिंदी को एक विशिष्ट पहचान प्रदान करती है। उन्होंने हिंदी-उर्दू विवाद में नागरी लिपि को उर्दू की फारसी-अरबी लिपि से अधिक उपयुक्त बताया। उनके तर्क थे कि नागरी लिपि भारत की प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ी है और यह हिंदी के ध्वनियों को सटीक रूप से व्यक्त करने में सक्षम है। पांडेय जी ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन द्वारा हिंदी के दमन की आलोचना की। उन्होंने लिखा, 'मुस्लिम शासन में हिंदी फारसी के साथ-साथ चलती रही पर कंपनी सरकार ने एक ओर फारसी पर हाथ साफ किया तो दूसरी ओर हिंदी पर।' उनके अनुसार, ब्रिटिश शासकों ने अंग्रेजी को प्रशासनिक भाषा बनाकर हिंदी को हाशिए पर धकेल दिया। उन्होंने स्वतंत्रता के बाद हिंदी को प्रशासनिक और शैक्षिक कार्यों में पुनर्स्थापित करने की मांग की, ताकि यह जनता की भाषा के रूप में अपनी जगह बना सके। उस समय हिंदी और उर्दू के बीच का विवाद केवल भाषा का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान का भी था। पांडेय जी ने अपने लेखों जैसे उर्दू का रहस्य, उर्दू की जुबान और उर्दू की हकीकत क्या है में तर्कसंगत ढंग से उर्दू के दावों का खंडन किया। उनका कहना था कि उर्दू, जो फारसी और अरबी शब्दों से प्रभावित है, भारत की मूल सांस्कृतिक परंपराओं को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करती। इसके विपरीत, हिंदी संस्कृत और प्राकृत से विकसित हुई है और भारत की मिट्टी से जुड़ी है। उन्होंने 'हिंदुस्तानी' के नाम पर हिंदी-उर्दू के मिश्रित रूप को राष्ट्रभाषा बनाने के प्रयासों का विरोध किया, क्योंकि उनका मानना था कि यह हिंदी की शुद्धता और सांस्कृतिक महत्व को कमजोर करेगा।

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