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Aathwein maale par swadhishthan

By: Material type: TextTextPublication details: New Delhi Vani Prakashan 2024Description: 88pISBN:
  • 9789357758512
Subject(s): DDC classification:
  • H TRI C
Summary: आठवें माले पर स्वाधिष्ठान काव्य-संकलन चिन्मयी त्रिपाठी की अन्तर्यात्रा का वह पड़ाव है जहाँ चेतना कुछ देर की ख़ातिर 'न ययौ न तस्थौ' की स्थिति में पड़ जाती है और सहसा समझ में नहीं आता, कहाँ से ढूँढ़ें। अक्सर यह थकमकाहट एक बड़ी छलाँग की पूर्वपीठिका सिद्ध होती है, और मुझे पूर्वापर अनुभवों से ऐसा लगता है कि चिन्मयी के लिए तो यह एक ख़ास तरह के उन्नयन की पूर्वसूचना है ही क्योंकि सुरों की तरह, साँसों की तरह इनकी दृष्टि भी एक लय में सध रही है जो शायद इस सृष्टि की मूल लय है : अपने से बाहर जाकर, रामझरोखे बैठकर जग का मुजरा लेती हुई उल्टे पाँव यह वापस अपनी ख़ुदी में, अन्तस्थ आत्मन् में लौट आती है। पूरा व्यक्तित्व जब स्पन्दन की एक विराट लहर हो जाये तो यात्रा पूरी हो जाती है। यह संग्रह बहिर्मुखी है– एक खोई हुई साँस जैसे स्वयं को ढूँढ़ने बाहर निकली है - संसार के हर उस प्राणी में अपना निवेश करती हुई जो दुखी है, और अपने भोलेपन में अवाक् भी कि लाख दरवाज़ा लगाओ, रोज़ एक दुःख अनाथ बच्चे-सा सामने खड़ा क्यों मिलता है। तरह-तरह के अनादृत लोग, जिनकी तनख़्वाह उनकी मेहनत और योग्यता के मुकाबले कुछ भी नहीं; कुशल शिल्पी, कारीगर, शास्त्रीय गायक, वादक, स्त्रियाँ, दर्जी और जूता गाँठने वाले जो व्यर्थ ही रोब गाँठने वाले लोगों से परेशान हैं। जैविक मातृत्व से परे जाकर सारी सृष्टि को माँ की नज़र से देखने का यह जज़्बा ही तो साहित्य और संगीत की उँगली चाहे-अनचाहे थमा जाता है।
List(s) this item appears in: New Arrivals August, 2026
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आठवें माले पर स्वाधिष्ठान काव्य-संकलन चिन्मयी त्रिपाठी की अन्तर्यात्रा का वह पड़ाव है जहाँ चेतना कुछ देर की ख़ातिर 'न ययौ न तस्थौ' की स्थिति में पड़ जाती है और सहसा समझ में नहीं आता, कहाँ से ढूँढ़ें। अक्सर यह थकमकाहट एक बड़ी छलाँग की पूर्वपीठिका सिद्ध होती है, और मुझे पूर्वापर अनुभवों से ऐसा लगता है कि चिन्मयी के लिए तो यह एक ख़ास तरह के उन्नयन की पूर्वसूचना है ही क्योंकि सुरों की तरह, साँसों की तरह इनकी दृष्टि भी एक लय में सध रही है जो शायद इस सृष्टि की मूल लय है : अपने से बाहर जाकर, रामझरोखे बैठकर जग का मुजरा लेती हुई उल्टे पाँव यह वापस अपनी ख़ुदी में, अन्तस्थ आत्मन् में लौट आती है। पूरा व्यक्तित्व जब स्पन्दन की एक विराट लहर हो जाये तो यात्रा पूरी हो जाती है। यह संग्रह बहिर्मुखी है– एक खोई हुई साँस जैसे स्वयं को ढूँढ़ने बाहर निकली है - संसार के हर उस प्राणी में अपना निवेश करती हुई जो दुखी है, और अपने भोलेपन में अवाक् भी कि लाख दरवाज़ा लगाओ, रोज़ एक दुःख अनाथ बच्चे-सा सामने खड़ा क्यों मिलता है। तरह-तरह के अनादृत लोग, जिनकी तनख़्वाह उनकी मेहनत और योग्यता के मुकाबले कुछ भी नहीं; कुशल शिल्पी, कारीगर, शास्त्रीय गायक, वादक, स्त्रियाँ, दर्जी और जूता गाँठने वाले जो व्यर्थ ही रोब गाँठने वाले लोगों से परेशान हैं। जैविक मातृत्व से परे जाकर सारी सृष्टि को माँ की नज़र से देखने का यह जज़्बा ही तो साहित्य और संगीत की उँगली चाहे-अनचाहे थमा जाता है।

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