Kalchuri rajvansh ka itihas
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TextPublication details: New Delhi Vani Prakashan 2026Description: 552pISBN: - 9789369447855
- H 954.02 SAN
| Item type | Current library | Call number | Status | Date due | Barcode | Item holds |
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Gandhi Smriti Library | H 954.02 SAN (Browse shelf(Opens below)) | Available | 181793 |
सुविख्यात कवि, आलोचक और इतिहासकार डॉ. जितेन्द्रकुमार सिंह 'संजय' की सद्यःसृजित कृति ' कलचुरि राजवंश का इतिहास' को देखकर मैं प्रसन्न तो हैं ही, आश्वस्त भी हूँ कि वर्तमान में इस राजवंश को उसके मूल और प्रमाणसम्मत अतीत से सम्पृक्त करके देखा जा रहा है। पिछली सदियों में राजाश्रय में लिखे गये इतिहास ग्रन्थों में यह बड़ी कमी रही कि लेखक मध्यकाल से ही किसी राजवंश का वर्णन करता और पूर्व के वर्णन को ब्रह्मा के सृष्टि- नियम से जोड़ देता। ऐसे ग्रन्थकर्ताओं को अभिलेखों की जानकारी नहीं होती थी, वे इसके लिए शोधन भी नहीं करते और प्रसन्नता के लिए कोई कहानी तैयार कर लेते। विष्णुपुराण, वायुपुराण, हरिवंशपुराण, शिवपुराण आदि में राजा सगर की जो कथा मिलती है, उसको मैं राजवंशों के लिए आबू पर यज्ञ, सरोवर में सूर्य को अर्घ्य जैसे कथानकों का आधार मानता हूँ और सोचता हूँ कि यदि पुराणों की वंशावली की धाराओं पर विशेष शोध होता तो राजवंशों को अपने उद्भव के लिए पुरोहितों और सूतों के किसी कथानक का आश्रय नहीं लेना पड़ता। नरशार्दूल, नरव्याघ्र जैसे शब्दों में सिंह जैसे सम्बोधन का सच निहित मिलता है। मत्स्यपुराण, पद्मपुराण, ब्रह्माण्डपुराण और वायुपुराण वे पुराण हैं, जिनके साथ परवर्ती माहात्म्यों और स्थल तथा औपपुराणों ने अपना सम्बन्ध बताया और वंशों, गोत्रों और प्रवरादि के विस्तार को उचित माना। यह हमारे यहाँ परम्परा में रहा है लेकिन संस्कृत-ज्ञान के अभाव में उधर ध्यान ही नहीं दिया गया और विदेशियों की सन्तान जैसी धारणाओं को घिसा गया। डॉ. जितेन्द्रकुमार सिंह 'संजय' ने ऐसी धाराओं और धारणाओं के विपरीत पुराणों और संस्कृत के सृजनमूलक वाङ्मय और स्थानीय अभिलेखों का तुलनात्मक परीक्षण करते हुए कलचुरियों के लिए जिन स्रोतों और सन्दर्भों को खोजा है, वह चकित करता है और उन विद्वानों से आगे के सोच को दिखाता है जो एक सीमा तक बँधे रह गये। हैहय राजवंश पुराणों में प्रमुखता के साथ वर्णित है और लेखक ने उसको कलचुरियों के उद्गम के रूप में अनेक तर्कों से सिद्ध किया है। आगे गोत्र, प्रवर आदि पर विस्तारपूर्वक चिचार किया है। पुरूरवस वंश के रूप में भी लेखक ने पौराणिक पृष्ठभूमि का परीक्षण करने के साथ ही यदुवंश का भी स्पर्श किया है। पुराण अपने आप में राजवंशों के स्रोत और उपजीव्य रहे हैं। विद्वान् पार्जीटर ने उनका अनेक रूप में परीक्षण किया है । सहस्रबाहु को लेखक ने इतिहास की समस्या के रूप में नहीं, बल्कि समाधान के रूप में प्रस्तुत किया है और माहिष्मति को कलचुरियों की प्राचीन भूमि के रूप में रेखांकित करते हुए 675 ई. तक के नरेशों के सन्दर्भ दिये। यह उचित ही होगा, क्योंकि इसके बाद 717 ई. का जो अभिलेख चित्तौड़गढ़ के निकट पुठोली से मिला, वह वहाँ की पीढ़ियों को टक्क या मरि कुल का बताता है। पुस्तक में विदर्भ, कालंजर, त्रिपुरी, सरयूपार, दक्षिणकोसल, रतनपुर (छत्तीसगढ़), रायपुर, सोण्ठिवपुर, कर्णाटक, हल्दी, कोपाचित (बलिया) और रीवा के कलचुरी राजवंश और वहाँ की वंशावलियों पर सप्रमाण विमर्श किया गया है। इसमें पूर्वापर सामग्री का सुन्दर समावेश किया गया है। कटच्चुरी, अहिहय आदि पर्याय और नामभेद को भी स्पष्ट किया गया है। —डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू' (फ़ैलो इण्डोलॉजी)

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