Samaya Sargam
Material type:
TextPublication details: New Delhi Rajkamal Prakashan 2024Description: 190pISBN: - 9788126715619
- H SOB K
| Item type | Current library | Call number | Status | Date due | Barcode | Item holds |
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Gandhi Smriti Library | H SOB K (Browse shelf(Opens below)) | Available | 181791 |
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| H SOB K Zindaginama | H SOB K A Ladki | H SOB K Wah Samay Yah Samay | H SOB K Samaya Sargam | H SOB K Yaron ke yaar | H SOB K 2nd ed. Badlon ke ghere | H SOM Somarset mom ki chuninda kahaniyan/ translated by Bhadrarsain Puri |
हम हैं तो समय है। हमारी ही चेतना में संचित है हमारा काल-आयाम। हम हैं, क्योंकि धरती है, हवा है, धूप है, जल है और यह आकाश। इसीलिए हम जीवित हैं। भीतर और बाहर- सब कहीं- सब कुछ को अपने में सँजोए। विलीन हो जाने को पल-पल अनन्त में...। पुरानी और नई- सदी के दो-दो छोरों को समेटता ‘समय सरगम’ जीए हुए अनुभव की तटस्थता और सामाजिक परिवर्तन से उभरा, उपजा एक अनूठा उपन्यास है; और फिर भारत की बुजुर्ग पीढ़ियों का एक ही साथ नया-पुराना आख्यान और प्रत्याख्यान। संयुक्त परिवारों के भीतर और बाहर वरिष्ठ नागरिकों के प्रति उपेक्षा और उदासीनता ‘समय सरगम’ की बंदिश में अंतर्निहित है। आज के बदलते भारतीय परिदृश्य में यह उपन्यास व्यक्ति की विश्वव्यापी स्वाधीनता, उसके वैचारिक विस्तार और कुछ नए संस्कार-संदर्भों को प्रतिध्वनित करता है। दूसरे शब्दों में, इससे उत्तर-आधुनिक काल की संभावनाओं को भी चीन्हा जा सकता है; और उन मूल्यों को भी जो मानवीय विकास को सार्थकता प्रदान करते हैं। ईशान और आरण्या जैसे बुजुर्ग परस्परविरोधी विश्वास और निजी आस्थाओं के बावजूद साथ होने के लिए जिस पर्यावरण की रचना करते हैं, वहाँ न पारिवारिक या सामाजिक उदासीनता है और न किसी प्रकार का मानसिक उत्पीड़न। कृष्णा सोबती की प्रख्यात कलम ने इस कथाकृति में अपने समय और समाज को जिस आंतरिकता से रचा है, वह वर्तमान सामाजिक यथार्थ को तात्त्विक ऊँचाइयों तक ले जाता है, और ऐसा करते हुए वे जिस भविष्य की परिकल्पना या उसका संकेत करती हैं, उसी में निहित है एक उद्भास्वर आलोक-पुंज।

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