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Supreme court ke 85 aitihasik judgments

By: Material type: TextTextPublication details: New Delhi Prabhat Prakashan Description: 256pISBN:
  • 9789355216403
Subject(s): DDC classification:
  • CS 342.54 AGR
Summary: सर्वोच्च न्यायालय जो व्याख्या करता है, वही देश का कानून होता है। इस पुस्तक में सर्वोच्च न्यायालय के 85 ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित विधि की व्यवस्था को प्रस्तुत किया गया है । विषय का हिंदी में रूपांतरण अत्यंत जटिल है, अत: सामान्य जन की समझ के लिए प्रथमत: तथ्यों को लिया गया है, फिर निर्णय का मुख्य अंश तथा अंत में मैंने अपना मंतव्य दिया है । सिविल सर्विसेज प्रतियोगितात्मक परीक्षा के लिए, अभ्यर्थी का मंतव्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है। प्रयास किया गया है कि समानता के मूल अधिकार से लेकर वर्तमान काल में भूमि सुधार एवं आर्थिक मामलों पर भी सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था प्रकाश में आए । परिशिष्टों में अधिकांश महत्त्वपूर्ण विषयों पर निर्णयों की सूची तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने ही निर्णयों में परिवर्तन की सूची भी दी गई है। बीच-बीच में संविधान के मुख्य-मुख्य प्रावधानों को भी रेखांकित किया गया है ताकि संविधान के उन प्रावधानों से संबंधित निर्णयों को समझने के लिए संविधान की किताब को न खोलना पड़े।
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सर्वोच्च न्यायालय जो व्याख्या करता है, वही देश का कानून होता है। इस पुस्तक में सर्वोच्च न्यायालय के 85 ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित विधि की व्यवस्था को प्रस्तुत किया गया है । विषय का हिंदी में रूपांतरण अत्यंत जटिल है, अत: सामान्य जन की समझ के लिए प्रथमत: तथ्यों को लिया गया है, फिर निर्णय का मुख्य अंश तथा अंत में मैंने अपना मंतव्य दिया है । सिविल सर्विसेज प्रतियोगितात्मक परीक्षा के लिए, अभ्यर्थी का मंतव्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है। प्रयास किया गया है कि समानता के मूल अधिकार से लेकर वर्तमान काल में भूमि सुधार एवं आर्थिक मामलों पर भी सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था प्रकाश में आए ।

परिशिष्टों में अधिकांश महत्त्वपूर्ण विषयों पर निर्णयों की सूची तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने ही निर्णयों में परिवर्तन की सूची भी दी गई है। बीच-बीच में संविधान के मुख्य-मुख्य प्रावधानों को भी रेखांकित किया गया है ताकि संविधान के उन प्रावधानों से संबंधित निर्णयों को समझने के लिए संविधान की किताब को न खोलना पड़े।

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