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Deh kutharia

By: Material type: TextTextPublication details: Delhi Setu 2021Description: 280 pISBN:
  • 9789391277031
Subject(s): DDC classification:
  • H JAD J
Summary: समाज में वर्गीकरण और विभेद के अनेक स्तर हैं। सम्भवतः स्त्री-पुरुष का लैंगिक विभाजन सबसे प्राचीन और सबसे सामान्य है। अस्मितामूलक विमर्शों के दौर आने से पूर्व इस लैंगिक विभाजन के द्वित्व से बाहर सोचना हमारे सामाजिक और वैयक्तिक समीकरणों से बाहर था। अस्मितामूलक विमर्श के दौर में, जब सप्रेस्ड आईडेंटिटी पर बातचीत होने लगी है, तब तृतीय लिंगी समुदाय भी हमारे सरोकारों के दायरे में है। इन तृतीय लिंगी समुदाय के लोगों को समाज अनेक अशिष्ट सम्बोधनों से नवाजता है मसलन-ट्रांसजेण्डर, किन्नर, हिजड़ा आदि। इन्हीं ट्रांसजेण्डरों के जीवन को अपनी कथावस्तु बनाता है - देह कुठरिया उपन्यास हमें ऐसे मानव-समूहों से जोड़ता है जो सामाजिक उपेक्षा के शिकार रहे हैं। जो मनुष्य होकर भी मनुष्य नहीं हैं। समाज होकर भी समाज के नहीं हैं। शायद परिवार के भी नहीं हैं। जो सिर्फ़ ट्रेनों में या चौराहों पर ताली बजाते या भीख माँगते दिखते हैं या बच्चों के जन्म पर नाचते-गाते दिखते हैं। ट्रांसजेण्डरों की ज़िन्दगी इतनी ही नहीं है, जितनी हम देखते हैं या जितना अनुमानतः समझते हैं। वे भी मनुष्य हैं। उनकी भी भावनाएँ वैसी ही हैं, जैसी एक सामान्य स्त्री या पुरुष की होती हैं। प्रेम, राग, आकर्षण, स्नेह, घृणा, क्रोध, ईष्या इत्यादि वे सभी भाव उनके अन्दर भी होते हैं। सामाजिक जीवन के सामान्यीकरण और सामान्य के विशिष्टिकरण की उनकी भी इच्छा होती है।
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समाज में वर्गीकरण और विभेद के अनेक स्तर हैं। सम्भवतः स्त्री-पुरुष का लैंगिक विभाजन सबसे प्राचीन और सबसे सामान्य है। अस्मितामूलक विमर्शों के दौर आने से पूर्व इस लैंगिक विभाजन के द्वित्व से बाहर सोचना हमारे सामाजिक और वैयक्तिक समीकरणों से बाहर था। अस्मितामूलक विमर्श के दौर में, जब सप्रेस्ड आईडेंटिटी पर बातचीत होने लगी है, तब तृतीय लिंगी समुदाय भी हमारे सरोकारों के दायरे में है। इन तृतीय लिंगी समुदाय के लोगों को समाज अनेक अशिष्ट सम्बोधनों से नवाजता है मसलन-ट्रांसजेण्डर, किन्नर, हिजड़ा आदि। इन्हीं ट्रांसजेण्डरों के जीवन को अपनी कथावस्तु बनाता है - देह कुठरिया

उपन्यास हमें ऐसे मानव-समूहों से जोड़ता है जो सामाजिक उपेक्षा के शिकार रहे हैं। जो मनुष्य होकर भी मनुष्य नहीं हैं। समाज होकर भी समाज के नहीं हैं। शायद परिवार के भी नहीं हैं। जो सिर्फ़ ट्रेनों में या चौराहों पर ताली बजाते या भीख माँगते दिखते हैं या बच्चों के जन्म पर नाचते-गाते दिखते हैं।
ट्रांसजेण्डरों की ज़िन्दगी इतनी ही नहीं है, जितनी हम देखते हैं या जितना अनुमानतः समझते हैं। वे भी मनुष्य हैं। उनकी भी भावनाएँ वैसी ही हैं, जैसी एक सामान्य स्त्री या पुरुष की होती हैं। प्रेम, राग, आकर्षण, स्नेह, घृणा, क्रोध, ईष्या इत्यादि वे सभी भाव उनके अन्दर भी होते हैं। सामाजिक जीवन के सामान्यीकरण और सामान्य के विशिष्टिकरण की उनकी भी इच्छा होती है।

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