Lekhak ka jantantra (Record no. 361892)

MARC details
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003 - CONTROL NUMBER IDENTIFIER
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005 - DATE AND TIME OF LATEST TRANSACTION
control field 20260824123810.0
020 ## - INTERNATIONAL STANDARD BOOK NUMBER
ISBN 9789387462472
082 ## - DEWEY DECIMAL CLASSIFICATION NUMBER
Classification number H 891.4309 SOB
100 ## - MAIN ENTRY--AUTHOR NAME
Personal name Sobti, Krishna
245 ## - TITLE STATEMENT
Title Lekhak ka jantantra
260 ## - PUBLICATION, DISTRIBUTION, ETC. (IMPRINT)
Place of publication New Delhi
Name of publisher Rajkamal Prakashan
Year of publication 2018
300 ## - PHYSICAL DESCRIPTION
Number of Pages 216p.
520 ## - SUMMARY, ETC.
Summary, etc कृष्णा सोबती के लिए लेखक की पहचान एक साधारण नागरिक का बस थोड़ा-सा विशेष हो जाना है। समाज की मंथर लेकिन गहरी और शक्तिशाली धारा में अपनी कीमत पर पैर जमाकर खड़ा हुआ एक व्यक्ति जो जीवन को जीते हुए उसे देखने की कोशिश भी करता है। उनके अनुसार लेखक का काम अपनी अन्तरभाषा को चीन्हते और सँवारते हुए अज्ञात दूरियों को निकटताओं में ध्वनित करना है।लेखक की इस पहचान को स्वयं उन्होंने जिस अकुंठ निष्ठा और मौन संकल्प के साथ जिया उसके आयाम ऐतिहासिक हैं। उनका लेखक सिर्फ लिखता नहीं रहा, उसने अपनी सामाजिक, राजनैतिक और नागरिक जि़म्मेदारियों का आविष्कार भी किया और लेखकीय अस्तित्व के सहज विस्तार के रूप में उन्हें स्थापित भी किया।उन्होंने कई बार पुरस्कारों और सम्मानों को लेने से इनकार किया क्योंकि वह उन्हें लेखक होने की हैसियत से ज़रूरी लगा। उन्होंने दशकों-दशक एक सम्पूर्ण रचना के अवतरण की धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की क्योंकि लेखक होने की उनकी अपनी कसौटी बहुत ऊँची और कठोर रही। लेखक के रूप में अपने युवा दिनों में ही उन्होंने अपने पहले और बड़े उपन्यास को एक प्रतिष्ठित प्रकाशक से छपाई के बीच में ही इसलिए वापस ले लिया कि उन्हें अपनी भाषा से खिलवाड़ स्वीकार नहीं था। उन्होंने जीवन के लगभग तीन दशक कॉपीराइट की सुरक्षा के लिए लोकप्रियता और राजनीतिक पहुँच की धनी ताकतों से अकेले अदालती लड़ाई लड़ी।और आज उन्हें अपने स्वास्थ्य से ज़्यादा चिन्ता इस बात की है कि सत्तर साल की आज़ादी के बाद देश फिर एक खतरनाक मोड़ पर है। वे रात-दिन सोचती हैं कि भेदभाव की राजनीति के चलते जैसे उन्हें 1947 में विभाजन की विभीषिका से गुज़रना पड़ा, कहीं आज की राजनीति वही समय आज के बच्चों के लिए न लौटा लाये! मौजूदा सरकार की राजनीतिक और वैचारिक संकीर्णताएँ उन्हें एक सात्विक क्रोध से भर देती हैं जिसमें पूरी सदी छटपटाती दिखाई पड़ती है।इस पुस्तक में हमने उनके कुछ चुनिन्दा साक्षात्कारों को संकलित किया है जो अलग-अलग कालखंडों में अलग-अलग आयु और भिन्न अनुशासनों के लेखकों, पत्रकारों और विचारकों ने उनसे किए। पाठक इन्हें पढक़र स्वयं महसूस करेगा कि साहित्य की, लेखक की और नागरिक की मुकम्मल तस्वीर कैसे बनती है।
650 ## - SUBJECT ADDED ENTRY--TOPICAL TERM
Topical Term Literary Theory, History & Criticism
9 (RLIN) 21482
942 ## - ADDED ENTRY ELEMENTS (KOHA)
Koha item type Books
Holdings
Lost status Home library Current library Date acquired Cost, normal purchase price Full call number Accession Number Koha item type Public Note
  Gandhi Smriti Library Gandhi Smriti Library 2026-08-24 495.00 H 891.4309 SOB 181768 Books 495.00

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